शिवसेना - घर भी बिखरा और उसकी पहचान तीरधनुष भी छिना


बाप दादा की बनाई पूँजी में कुछ अपनी तरफ से जोड़ सको तो वह उपलब्धि होती है।

लेकिन अपेक्षा यही रहती है कि कुछ जोड़ न सको तो उसे घटाओ मत..!
        
shiv sena symbol frozen। शिवसेना सिम्बल फ्रीज
shiv sena symbol frozen। शिवसेना सिम्बल फ्रीज


इतने में ही सीमित होती है पूत और कपूत के मध्य का अन्तर।

स्व बाला साहब ठाकरे के पूत्र होने के नाते जन्म सूत्र से मिले शिवसेना रुपी विरासत को उध्दव ठाकरे ने तहस नहस कर दिया है।

जन्मसूत्र इसलिये लिख रहा हुँ क्योंकि अगर परिवार सूत्र से शिवसेना के नेतृत्व का निर्धारण होता तो शायद बाला साहब के बाद शिवसेना का नेतृत्व करने के असली अधिकारी राज ठाकरे थे।

खैर जिस विरासत की चर्चा कर रहा हुँ वह दल की पहचान है।

राजनीतिक दल की सबसे बड़ी पूँजी उसकी पहचान अर्थात सिम्बल से होती है।

जो शिवसेना के दोनो धड़ो से अस्थाई तौर पर ही सही छिन गई है।

निर्वाचन आयोग ने आसन्न विधानसभा उपचुनाव के दृष्टिगत दोनो खेमो शिवसेना शिंदे और शिवसेना ठाकरे से स्थाई चुनावी पहचान "तीरधनुष" का शिवसेना सिम्बल फ्रीज  छिन लिया है।

इस स्थिति में शिंदे खेमे को जितना नुकशान नही है,उससे कही अधिक नुकशान उध्दव ठाकरे खेमे को हुआ है।

बाला साहब ठाकरे की बनाई विरासत को समाप्त कर दिया है।
कहते है न इँसान की बरबादी में अहँकार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

उध्दव ठाकरे के मामले में भी पतन का कारण अहँकार है।
जिस अहँकार के चलते ऐसे अँधे हुये कि न सँगठन दिखा,न सँगठन की विचारधारा दिखी और न ही सँगठन के सहकर्मी ....!

योग्यता के विपरीत जन्मसूत्र से मिले पार्टी के नेतृत्व ने उल्टा उध्दव ठाकरे के दो पक्षो को भी उजागर कर दिया है।

वे न कुशल सँगठनकर्ता सिध्द हो पाये और न ही सत्ता में दल को नेतृत्व दे पाये ?

पार्टी में असँतोष पनप रहा था और सँगठन का नेता बेखबर था।
पार्टी के आधे निर्वाचित प्रतिनिधि बगावत कर देते है और नेता अपनी अहँकार के चलते बेखबर थे।

उध्दव ठाकरे की भूल उनकी नकल की प्रवृत्ति बन गई।

जन्म सूत्र से प्राप्त नेतृत्व को समझ नही पाये और स्वयँ को बाला साहब ठाकरे समझ बैठे थे।

लेकिन यह भूल गये थे कि बाला साहब के विशाल कद को पाने के लिये त्याग और परिश्रम की आवश्यकता होती है।

लाखो कार्यकर्ताओ का प्यार और समर्पण हासिल करना होता है।

न की रातोरात बाला साहब जैसे कमाण्ड करने की अदभूत क्षमता अर्जित करने हेतु उनकी नकल करना।

बाला साहब ठाकरे को शिवसेना से प्यार था। प्रत्युत सँगठन के लाखो कार्यकर्ता बाला साहब से प्रेम करते थे। जिस प्रेम की शक्ति के बिना पर वे न सिर्फ सँगठन के निर्विवाद कमाण्डर थे,बल्कि आम मराठी जनता के हृदय सम्राट थे।

बावजूद इसके शिवसेना के लाखो कार्यकर्ता चाहे वह एकनाथ शिंदे हो या फिर छोटे से छोटा कार्यकर्ता, सब सराहना के हकदार है।

शिवसैनिकों के धैर्य की सराहना करना होगी, जिन्होने बाला साहब के बाद उध्दव ठाकरे को पर्याप्त समय दिया की वे अपनी जिम्मेदारियों को समझ सके।

लेकिन जब निचले कार्यकर्ताओं तक यह बात घर कर गई कि नेतृत्व निरँकुश है तो उनका धैर्य जवाब दे गया।

जिस दिन शिवसेना ने काँग्रेस और एनसीपी का हाथ थामा था। उसी दिन धारणा बन गई थी कि एक राजनीतिक दल के तौर पर शिवसेना के पतन का आरँभ हो गया है।

जिस समय बगावत सामने आई थी उस दिन उस धारणा को आधार मिल गया था कि बाला साहब के शिवसेना का वैचारिक रुप से धूर विरोधी काँग्रेस व एनसीपी के साथ मिलकर सत्ता के सफर का निर्णय एक तरफा था और उक्त निर्णय में सँगठन की आम राय नही थी।

ऐसे अहँकार में डुबे और चाटुकारो से घिरे नेता का हश्र यही होता है।
पार्टी खण्डित हो जाती है और उसकी पहचान उसका चुनावी छाप शिवसेना सिम्बल फ्रीज हो जाती है।