बचपन की यादें है..कही भूल मत जाना रे 

                                                       मनाते थे पोला 
                                                       गाय-बैल को खिलाते थे गूड़ का गोला
//@@// आज छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध पोला त्यौहार है। इसदिन घर की लक्ष्मी स्वरुप गाय, बैलो का पूजन किया जाता है।

                                                 (इस त्योहार से जुडे़ मेरे सँस्मरण..)

 Pola festival memoir in hindi-  बचपन में आज के दिन के लिये अर्थात पोला उत्सव की तैयारी एक-दो दिन पूर्व आरम्भ हो जाया करती थी।
                                                       
pola festival memoir in hindi

                                                 

इस विशेष अवसर के लिये घर के गोधनो की पूजा के लिये पूजन सामग्री के साथ ही साज सज्जा हेतु आकर्षक डेकोरेटिव सामग्रियो की खरीदी होती थी।

बड़ी गहमागहमी का होता था पोला पर्व के दिन..!

सुबह घर के गाय और बैलो को नहला धूलाकर तैयार किया जाता था।

गोधनो की साज-सज्जा हेतु बाजार से डेकोरेशन की सामग्रियो के साथ ही माहुर (रँग), आलता , चुड़ी रँगो के साथ ही बैलो के सीगों को रँगने हेतु पेन्ट लिया जाता था।

इसके पश्चात गाय और बैलो की पारम्परिक ढँग से पूजा की जाती थी।

पूजन विधि के पश्चात मवेशियो को अकरी दाना,खल्ली(oil cake),कटिया के साथ साथ ,गूड़ का भोग लगाया जाता था।

गोधनो के भोग के पश्चात सब को प्रसाद वितरित होता था।

इसदिन पर गायो को दुहने,रखरखाव आदि कार्यो हेतु वर्ष भर सेवा देनेवालो को घर के बड़े लोग ईनाम दिया करते थे।

इतने सबके बाद पर्व के अगले आकर्षण के तौर पर अपने सजीले बैलो को लेकर पशु मेला और प्रतियोगिता में जाना होता था।

हमारे शहर में पोला पर्व के अवसर पर नगर के मध्य स्थित शनिचरी बाजार में पशुओ का प्रदर्शन और स्पर्धा का आयोजन रहता था।

पोला के दिन आगे आगे बैल और पीछे पीछे पैदल गोधनो के रखवार के साथ हम लोग हँसते मस्ती करते गन्तव्य शनिचरी बाजार का रुख करते थे।

आज सोचो तो विश्वास नही होता है। लेकिन वह समय बचपन का था, उत्साह में कोई कमी नही थी।

तभी तो हमारे घर से शनिचरी बाजार की दूरी लगभग छह से साढ़े छह किलोमीटर थी।
इतनी दूरी पैदल जाना और वहाँ पहुँचकर सारा समय मटरगश्ती करते घूम- घूमकर चारो तरफ से पहुँचे सजीले बैल जोड़ियो को निहारने में समय बितता था।

इस क्रम में साथ ही साथ मेला सदृश्य आयोजन स्थल पर उपलब्ध खाने की वस्तुये भी व्यस्त रखती थी।

व्यस्तता भरे दिन के बाद भी शाम तक घर लौटकर आने तक थकान लेष मात्र नही होता था।

लेकिन घर आकर हाथ मुँह धोकर बिस्तर पर जब निढाल होकर पड़ते तो स्वप्न लोक में कब गुम हो जाते थे, पता ही नही पड़ता था।

रात में माँ नींद में आछन्न नीम बेहोशी की अवस्था में कब उठाकर दूध रोटी खिलाती,पता ही नही होता था।

कई वर्षो तक चला यह क्रम सुखद अनुभव के तौर पर याद है।
उस क्रम में एक वर्ष हमारे बैल जोड़ी को सून्दर और स्वस्थ होने के कारण दूसरा ईनाम मिला था।

आज न खेत रहा और न गोधन.
शेष है तो स्मृतियाँ और पर्व ?
पर्व वह भी सीमित होकर ग्रीटिंग्स में सिमट गया है।

गाय-बैल थे देशी नस्ल, विशुध्द देशी था पोला पर्व 
आज अँग्रेजी में शुभकामना कर, जड़ से जुड़े होने का हो रहा गर्व.