बर्गर बोले तो बकवास
वडापाव बोले तो झकास
World Vada Paav Day 2022 in hindi- किसी स्थान को विशिष्ट पहचान देने में स्वादिष्ट व्यँजन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
ऐसे ही दो व्यँजनो का मन में ख्याल आते ही मन में मुँम्बई का ध्यान हो आता है।
जी हाँ, बात कर रहा हुँ वड़ा पाव और पाव भाजी की..!
दोनो ही स्वादिष्ट व्यँजन एक दुसरे से भिन्न होने के बावजूद एक समानता होती है।
दोनो ही व्यँजनो में पाव (ब्रेड) का उपयोग होता है।
ऐसे ही दो व्यँजनो का मन में ख्याल आते ही मन में मुँम्बई का ध्यान हो आता है।
जी हाँ, बात कर रहा हुँ वड़ा पाव और पाव भाजी की..!
दोनो ही स्वादिष्ट व्यँजन एक दुसरे से भिन्न होने के बावजूद एक समानता होती है।
दोनो ही व्यँजनो में पाव (ब्रेड) का उपयोग होता है।
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| World Vada Paav Day 2022 in hindi |
इन्ही दो व्यँजनो में से एक वड़ा पाव की चर्चा आज के दिन करना आवश्यक हो जाता है क्योंकि मुम्बईकर आज के दिन अर्थात 23 अगस्त के दिन को वर्ल्ड वड़ा पाव डे के तौर पर मनाते है।
वड़ापाव आम मुम्बईकर( मुँबई के निवासी) के दैनिक जीवन का महत्वपूर्ण अँग है।
हालाँकि यह व्यँजन महाराष्ट्र के अन्य जगहो पर भी चाव से खाया जाता है।
लेकिन अगर इसके प्लेस आफ ओरिजीन की बात की जाय तो यह सम्मान निश्चित तौर पर मुँबई के हिस्से में जाता है।
मुँम्बई के इस लोकप्रिय डिश की उपयोगिता इतनी है, कि इसका सेवन मुम्बई के लोग (आमजन से लेकर खास तक) सुबह से लेकर रात तक करते है।
वड़ापाव मुँम्बई के सड़क किनारे,गली चौक चौराहो पर सहजता से उपलब्ध रहता है।
इसका महत्व केवल मुँबईकर ही जानते हैं। यही कारण है कि पाव (ब्रेड) और आलू से बनने वाले (बड़ा- जिन्हे मुँम्बई के स्थानीय लोग वड़ा पुकारते है) वड़ा हर उम्र और हर वर्ग के लोगो के मध्य समान रुप से लोकप्रिय है।
मुँम्बई के हर बाजार, सड़क और गली-मोहल्ले में आसानी से मिलने वाला वड़ा पाव मुँबईकर के नियमित आहार का अँग है।
वड़ा पाव का महत्व मुँबई के जनजीवन में कितना महत्वपूर्ण है ?
इसका अँदाज इसी बात से चलता है कि प्रति वर्ष 23 अगस्त के दिन को मुम्बईकरो के व्दारा विश्व वड़ा पाव दिवश(World Vada Paav) के तौर पर मनाया जाता है।
तेईस अगस्त के दिन को विशेष तौर पर वर्ल्ड वड़ापाव दिवस (World Vada Paav Day) का चिन्हाँकन दर्शाता है कि खाद्य का महत्व मुँम्बई के जनजीवन में कितना है।
आज के दिन अर्थात वर्ल्ड वड़ापाव डे के अवसर पर मुम्बईवासी वड़ापाव का स्वाद लेकर एक प्रकार से इस खाँटी देशी व्यँजन के प्रति अपना प्यार और जुड़ाव व्यक्त करते है। सँभवत: मराठी होने के गर्व का अनुभव करते है।
इस दिन को वड़ापाव का सेवन करके एवँ
इँटरनेट के दौर में वर्ल्ड वड़ापाव दिवश से सँबँधीत प्रचार सामग्रियाँ विभिन्न सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स पर सँदेशो के माध्यम से आदान प्रदान कर मनाते है।
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| vadapav day slogan, |
वड़ापाव के प्रचलन में आने की पृष्ठभूमि व इतिहास
World Vada Paav Day 2022 in hindi special
वड़ापाव का इतिहास 1960-70 के दशक में महाराष्ट्र और विशेषकर मुँम्बई में चले मराठी जागरण आँदोलन में नीहित है।
जननायक स्व बालासाहब ठाकरे के नेतृत्व में चले उक्त आँदोलन के मूल में मराठी सँस्कृति का उत्थान और मराठी मानुष के आर्थिक स्वावलँबन का भाव नीहित था।
उस दौर में महाराष्ट्र का हृदय एवँ आर्थिक गतिविधियों के केन्द्र मुँम्बई में बाहर से आकर बसे विभिन्न प्रदेशो के लोगो का वर्चस्व था।
जहाँ बड़े और मझौले व्यवसायो,मिल फैक्ट्रियों में गुजरातियो का वर्चस्व था। तो वही अपेक्षाकृत छोटे प्रकृति के व्यवसायो पर दक्षिण भारतीय मूल के लोगो का प्रभूत्व था।
इन वर्गो की तुलना में स्थानीय मराठी जनो की साँस्कृतिक एवँ आर्थिक स्थिति कमजोर थी।
बाला साहब ठाकरे की अगुवाई में चले मराठी जागरण आँदोलन में बतौर राजनीतिक सँगठन शिवसेना अगर सामाजिक और राजनीतिक पक्ष का ध्वज वाहक था।
तो वड़ापाव जैसे उपक्रम जनजागरण आँदोलन में मराठी जनता के आर्थिक स्वावलँबन का द्योतक था।
साठ और सत्तर के दशक में प्रबल हुये मराठित्व के भाव के चलते मुँम्बई की कपड़ा मिलो और कल-कारखानों में हड़ताल और लाकडाउन आम बात थी।
आम मराठी जनता जो मिलो और फैक्ट्रियों से श्रममूलक गतिविधियों से युक्त थी। वह कल- कारखानों के बाधित होने पर आर्थिक रुप से अधिक प्रभावित होती थी।
मराठी मूल की जनता के अधिकारो के लिये होनेवाले हड़तालो के कारण सर्वाधिक प्रभावित वर्ग मराठी जनता ही थी।
ऐसी परिस्थितियों में स्वर्गीय बालासाहब ठाकरे में मराठी जनता के आर्थिक स्वावलँबन का चिन्तन कही न कही था।
उस दौर में दक्षिण भारतीयो के व्दारा सँचालीत होनेवाले इडली-दोसा आदि के लिये प्रसिद्ध उड़ुपी रेस्टोरेंट्स का प्रभाव कही न कही बाला साहब ठाकरे पर था।
बाला साहब ठाकरे के चिन्तन में आम मराठी जनो के आर्थिक स्वावलँबन और आत्मनिर्भरता का पक्ष था।
ऐसे एक समय पर बाला साहब के आव्हान से प्रभावित होकर कतिपय अशोक वैद्य नामक सज्जन ने वर्ष 1966 में ( सँभवत: 23 अगस्त का दिन था ) दादर के रेल्वे स्टेशन के बाहर स्टाल लगाकर वड़ा,पोहा, ओमलेट और पाव के विक्रय का कार्य आरम्भ किया गया था।
प्रतिदिन दादर के रेल्वे स्टेशन से मुँम्बई के उपनगरो और पार्शवर्ती इलाको में स्थित कपड़ा कारखानो में कार्यरत हजारों की सँख्या में गुजरनेवाले श्रमिक इस स्टाल से लाभाँवित होते थे।
आरम्भ में वड़ा और पाव जैसा कोई काम्बिनेशन था ही नही।
इसकी जगह वैद्य जी के स्टाल पर अण्डे का ओमलेट और पाव(ब्रेड) विक्रय होता था।
स्टाल की सफलता के कुछ समय पश्चात स्टाल के सँचालक अशोक वैद्य ने बतौर प्रयोग कर पाव (ब्रेड) के मध्य में आलू वड़ा और चटनी डालकर पेश करना आरम्भ किया था।
जो देखते ही देखते लोगो के मध्य लोकप्रिय हो गया था और
यही से मुँम्बई के प्रसिद्ध वड़ापाव नामक व्यँजन का जन्म हुआ।
जननायक स्व बालासाहब ठाकरे के नेतृत्व में चले उक्त आँदोलन के मूल में मराठी सँस्कृति का उत्थान और मराठी मानुष के आर्थिक स्वावलँबन का भाव नीहित था।
उस दौर में महाराष्ट्र का हृदय एवँ आर्थिक गतिविधियों के केन्द्र मुँम्बई में बाहर से आकर बसे विभिन्न प्रदेशो के लोगो का वर्चस्व था।
जहाँ बड़े और मझौले व्यवसायो,मिल फैक्ट्रियों में गुजरातियो का वर्चस्व था। तो वही अपेक्षाकृत छोटे प्रकृति के व्यवसायो पर दक्षिण भारतीय मूल के लोगो का प्रभूत्व था।
इन वर्गो की तुलना में स्थानीय मराठी जनो की साँस्कृतिक एवँ आर्थिक स्थिति कमजोर थी।
बाला साहब ठाकरे की अगुवाई में चले मराठी जागरण आँदोलन में बतौर राजनीतिक सँगठन शिवसेना अगर सामाजिक और राजनीतिक पक्ष का ध्वज वाहक था।
तो वड़ापाव जैसे उपक्रम जनजागरण आँदोलन में मराठी जनता के आर्थिक स्वावलँबन का द्योतक था।
साठ और सत्तर के दशक में प्रबल हुये मराठित्व के भाव के चलते मुँम्बई की कपड़ा मिलो और कल-कारखानों में हड़ताल और लाकडाउन आम बात थी।
आम मराठी जनता जो मिलो और फैक्ट्रियों से श्रममूलक गतिविधियों से युक्त थी। वह कल- कारखानों के बाधित होने पर आर्थिक रुप से अधिक प्रभावित होती थी।
मराठी मूल की जनता के अधिकारो के लिये होनेवाले हड़तालो के कारण सर्वाधिक प्रभावित वर्ग मराठी जनता ही थी।
ऐसी परिस्थितियों में स्वर्गीय बालासाहब ठाकरे में मराठी जनता के आर्थिक स्वावलँबन का चिन्तन कही न कही था।
उस दौर में दक्षिण भारतीयो के व्दारा सँचालीत होनेवाले इडली-दोसा आदि के लिये प्रसिद्ध उड़ुपी रेस्टोरेंट्स का प्रभाव कही न कही बाला साहब ठाकरे पर था।
बाला साहब ठाकरे के चिन्तन में आम मराठी जनो के आर्थिक स्वावलँबन और आत्मनिर्भरता का पक्ष था।
ऐसे एक समय पर बाला साहब के आव्हान से प्रभावित होकर कतिपय अशोक वैद्य नामक सज्जन ने वर्ष 1966 में ( सँभवत: 23 अगस्त का दिन था ) दादर के रेल्वे स्टेशन के बाहर स्टाल लगाकर वड़ा,पोहा, ओमलेट और पाव के विक्रय का कार्य आरम्भ किया गया था।
प्रतिदिन दादर के रेल्वे स्टेशन से मुँम्बई के उपनगरो और पार्शवर्ती इलाको में स्थित कपड़ा कारखानो में कार्यरत हजारों की सँख्या में गुजरनेवाले श्रमिक इस स्टाल से लाभाँवित होते थे।
आरम्भ में वड़ापाव जैसा कोई व्यँजन नही था
आरम्भ में वड़ा और पाव जैसा कोई काम्बिनेशन था ही नही।
इसकी जगह वैद्य जी के स्टाल पर अण्डे का ओमलेट और पाव(ब्रेड) विक्रय होता था।
स्टाल की सफलता के कुछ समय पश्चात स्टाल के सँचालक अशोक वैद्य ने बतौर प्रयोग कर पाव (ब्रेड) के मध्य में आलू वड़ा और चटनी डालकर पेश करना आरम्भ किया था।
जो देखते ही देखते लोगो के मध्य लोकप्रिय हो गया था और
यही से मुँम्बई के प्रसिद्ध वड़ापाव नामक व्यँजन का जन्म हुआ।
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| World Vada Paav Day 2022 in hindi |
वड़ापाव का रातोरात लोकप्रिय होने का कारण
इस व्यँजन के लोकप्रिय होने के पीछे प्रमूख कारण था कि मराठी जनता ने मराठी अस्मिता से जोड़कर इसे भावनात्मक तौर पर ग्रहण किया था।
वड़ा पाव की लोकप्रियता की दूसरी वजह थी इसका अपेक्षाकृत सस्ता होना,सहजता से बनाये जाने लायक और सेवन में सहजता थी।
ध्यान से देखा जाय तो वड़ापाव की उत्पत्ति के लक्ष्य में आरम्भ से कामकाजी लोग रहे थे।
जैसा की सर्वविदित है कि मुँबई की लाईफ लाइन लोकल ट्रेन है।
ऐसे में भागमभाग भरी जीवन शैली और भीडभाड़ वाली लोकल ट्रेनो के सफर के दौरान कामकाजी लोगो के लिये लोकल ट्रेन में सफर के दौरान सहजता से खाये जाने योग्य भोजन जनस्वीकार्यता का कारण बना था।
मुख्य भोजन के सदृश्य वड़ापाव के होने के कारण व्यँजन लोकप्रिय हुआ था।
वड़ापाव का मराठी राजनीति की पहचान शिवसेना की सफलता में उल्लेखनीय योगदान है
World Vada Paav Day 2022 in hindi special
उन्नीस सौ साठ, सत्तर एवँ अस्सी के दशक में मराठी आँदोलन के राजनीतिक फ्रन्ट शिवसेना की सफलता में वड़ापाव का योगदान रहा है।दरअसल मराठी जनता के अधिकारो के लिये कारखानो में चलनेवाले आँदोलनो और काम बन्द हड़तालो के कारण बड़ी सँख्या में लोग बेरोजगार हो जाया करते थे। बेरोजगारो की अधिक मार मराठी जनो पर पड़ती थी।
इन्ही बेरोजगार हुये लोगो को बाद में जीविकोपार्जन के लिये बाला साहब ठाकरे के आव्हान पर शिवसेना के सहयोग से वड़ापाव का स्टाल आरम्भ करने हेतु मदद की जाती थी।
यही नव उद्यमी मराठी मानुष कालाँतर में न सिर्फ आर्थिक तौर पर सक्षम और आत्मनिर्भर बने बल्कि शिवसेना के ठोस आधार भी बने।
बदलते समय के साथ वड़ा पाव का मेक ओव्हर
समय के साथ वड़ा पाव जैसे खाँटी देशी व्यँजन को पीजा-बर्गर जैसे पाश्चात्य भोजन सामग्रियो की ओर आकर्षित होनेवाली नई पीढ़ी के मध्य स्वीकार्यता बढ़ाने हेतु विगत वर्षो में प्रयास देखने के आया है।वर्तमान में वड़ा पाव को बतौर देशी बर्गर के तौर पर प्रचारित कर विक्रय करने जैसे फूड चेन मुम्बई में अस्तित्व में है।
वड़ा पाव को इँडियन बर्गर स्टाइल में लाने की शुरुआत 23 अगस्त 2001 वर्ल्ड वड़ापाव दिवस (World Vada Paav Day) को उद्यमी धीरज गुप्ता ने की थी।
उनके व्दारा आरम्भ की गई जँबो वड़ापाव फूड चेन ने बतौर देशी बर्गर के तौर पर वड़ापाव परोसना आरम्भ किया था।
इसे padhe
वड़ापाव पश्चिमी रेसिपी बर्गर का देशी सँस्करण कहा जाय तो अनुचित नही होगा।
इसे पाव (ब्रेड) के बीच आलू से निर्मित वड़ा के साथ चटनी व प्याज, टमाटर, खीरा आदि जैसी सैलर्ड सब्जियाँ स्टफ कर परोसा जाता है और स्वादानुसार फ्राई की हुई नमकीन हरी मिर्च के साथ वर्ल्ड वड़ापाव दिवस (World Vada Paav Day) खाया जाता है।
वड़ापाव की रेसिपी
वड़ापाव पश्चिमी रेसिपी बर्गर का देशी सँस्करण कहा जाय तो अनुचित नही होगा।
इसे पाव (ब्रेड) के बीच आलू से निर्मित वड़ा के साथ चटनी व प्याज, टमाटर, खीरा आदि जैसी सैलर्ड सब्जियाँ स्टफ कर परोसा जाता है और स्वादानुसार फ्राई की हुई नमकीन हरी मिर्च के साथ वर्ल्ड वड़ापाव दिवस (World Vada Paav Day) खाया जाता है।




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